कहा जाता है और लिखा भी जाता है कि देश में शिक्षा का प्रसार तेजी से हुआ और हो रहा है। और यह भी कि सामाजिक जागरूकता भी बढ़ी है और बढ़ रही है। लोग सजग-सतर्क हैं अपने अधिकारों के प्रति। संविधान प्रदत्त अधिकारों से बखूबी परिचित देश के नागरिक लोकतंत्र के पायों को मजबूत कर रहे हैं। चौकस मीडिया की नजरें अपेक्षा के अनुरूप 'वाच डॉग' की भूमिका को अंजाम दे रही हैं। तब कोई हताश, निराश क्यों हैं? लेखक, कवि, व्यंग्यकार, मंच संचालक और संपादक के रूप में ख्याति अर्जित कर चुके राजेंद्र पटोरिया आज मिले। साथ में पत्रकार और राष्ट्रीय पुस्तक मेला के संयोजक चंद्रभूषण भी थे। विभिन्न विषयों पर चर्चा के दौरान दोनों फूट पड़े कि आज देश को सबसे बड़ा खतरा अगर किसी से है तो वह है सरकारी आतंकवाद। पटोरियाजी ने यह भी जोड़ दिया कि मीडिया से भी खतरे मौजूद हैं। मेरी जिज्ञासा पर इन दोनों ने पुस्तक मेला के आयोजन में शासकीय स्तर पर उठाई गई कतिपय अड़चनों की जानकारी दी, जबकि ये पिछले 15 वर्षों से नागपुर में पुस्तक मेले का आयोजन करते आ रहे हैं। हर राज्य के अनेक क्षेत्रों में इनके आयोजन होते हैं। दोनों नागपुर के एक आईएएस अधिकारी के बर्ताव पर क्षुब्ध थे। कहा कि ''हमसे अभद्र बर्ताव किया गया, चुनौती दी गई कि आप आयोजन कर दिखाएं।'' इन पर अविश्वास का कोई आधार नहीं है। हां, यह आश्चर्य अवश्य कि एक युवा आईएएस अधिकारी ने गरिमा का त्याग कैसे कर दिया? ऐसा नहीं होना चाहिए था। संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा उत्तीर्ण कर कुशाग्र बुद्धिधारी युवा भारतीय प्रशासनिक अधिकारी के रूप में प्रशासन की बागडोर सम्हालते हैं। बाबुओं की लालफीताशाही पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी उन पर होती है। इस दायित्व का निर्वाह ये बखूबी कर भी रहे हैं। फिर ऐसा क्यों कि समाज के दो जिम्मेदार व्यक्ति इनमें से किसी को 'आतंक' के रूप में देखने लगे। क्या इस पर सामाजिक चिंतन की जरूरत नहीं? इस प्रक्रिया के द्वारा ही संयम खोते-भटके अधिकारियों को सही रास्ते पर लाया जा सकता है। भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा के हाथों में ही पूरे प्रशासन की बागडोर है। अर्थात प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ हैं ये। इन पर कोई दाग न लगे, आभा की चमक धूमिल न हो, इसकी जिम्मेदारी स्वयं प्रशासनिक अधिकारियों पर है। अपने दायित्व के प्रति ईमानदारी और आवेश पर नियंत्रण से ही ऐसा संभव है। क्या वे निराश करेंगे?
सामाजिक जागरूकता और मीडिया की 'वास्तविकता' पर आज सुख्यात सामाजिक कार्यकर्ता गिरीश गांधी भी निराश दिखे। एक प्रसंग में उन्होंने मुझसे पूछा कि आप जो बेबाक लिखते हैं, उससे आपको क्या मिलता है? उनकी इस जिज्ञासा का आधार मीडिया का वर्तमान 'सच' था। अपने सामाजिक और पत्रकारीय दायित्व बताने पर उन्होंने शून्य परिणाम को रेखांकित करते हुए निर्णय दे डाला कि इस देश में कुछ नहीं होने वाला। पिछले 4 दशक से अपनी जिंदगी के हर पल को समाज को समर्पित करने वाले व्यक्ति के मुख से ऐसी निराशाजनक बातें निकले, तब यह आमंत्रण है नये सिरे से पूरी व्यवस्था पर पुनर्विचार हेतु राष्ट्रीय बहस का। क्या कोई इस हेतु पहल करेगा? प्रतीक्षा रहेगी।
Saturday, December 5, 2009
Friday, December 4, 2009
राजेंद्र प्रसाद की स्मृति में कोई दिवस?
-2 अंतिम
आज यह बात अजीब तो लगेगी, किंतु आंशिक रूप से ही सही यह सच है कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद के व्यक्तित्व ने नेहरू के अंदर एक नकारात्मक कुंठा पैदा कर दी थी। अनेक घटनाएं प्रमाणbebak 5 december part-2 के रूप में मौजूद हैं। नेहरू नहीं चाहते थे कि राजेंद्र प्रसाद के व्यक्तित्व को प्रचार-प्रसार मिले। उन्हें देश-विदेश अर्थात् घर और बाहर दोनों जगह लोगों से दूर रखने की कोशिश की जाती थी। इसके लिए स्वयं नेहरू ही पहल करते थे। डॉ. आंबेडकर की दिल्ली में मृत्यु के पश्चात उनका अंतिम संस्कार 7 दिसंबर 1956 को मुंबई की चौपाटी पर किया गया। प्रसाद और नेहरू दोनों उपस्थित थे। महाराष्ट्र की परंपरा के अनुसार, संस्कार स्थल पर शोकसभा का आयोजन किया गया। जब नेहरू को यह पता चला कि वक्ताओं में डॉ. प्रसाद का भी नाम है तब वे बेचैन हो उठे। उन्होंने सीधे राजेंद्र बाबू को ही यह कहकर बोलने से रोकने की कोशिश की कि 'राष्ट्रपति के लिए उचित नहीं होगा'। राजेंद्र बाबू ने यह जवाब देकर कि ''यह महान आत्मा इसकी अधिकारी है'' नेहरू को निरूत्तर कर दिया। इसी तरह एक बार राजेंद्र बाबू काशी विश्वनाथ मंदिर दर्शन के लिए गए। पारिवारिक परंपरानुसार उन्होंने मंदिर में प्रधान पुरोहित के गंगाजल से चरण धोए। नेहरू ने तब पत्र लिखकर आपत्ति जताई। वही पुराना आलाप कि राष्ट्रपति को ऐसा शोभा नहीं देता। राजेंद्र बाबू ने जवाब भेजा दिया कि निजी धार्मिक आस्था राष्ट्रपति पद पर तिरोहित नहीं की जा सकती। आज राष्ट्रपति की बार-बार विदेश यात्रा पर किसी को आश्चर्य नहीं होता।राजेंद्र बाबू को विदेश यात्रा की अनुमति नेहरू मंत्रिमंडल बिरले ही दिया करता था। छोटे-छोटे देशों की यात्रा पर ही राजेंद्र प्रसाद जा सके थे। नेहरू नहीं चाहते थे कि विश्व समुदाय में राजेंद्र बाबू की आभा-विद्वता चमके। 1961 में एक बार राजेंद्र बाबू गंभीर रूप से बीमार पड़े। बचने की उम्मीद कम थी। लाल बहादुर शास्त्री ने नेहरू से अंतिम संस्कार के लिए स्थल चयन पर बातचीत की। शास्त्री और नेहरू दोनों मोटरकार से जगह देखने निकले। शास्त्री ने महात्मा गांधी के समाधि स्थल की बगल की खाली जगह को चुना। नेहरू ने तपाक से कहा कि नहीं, नहीं, इसे तो मैंने अपने लिए सुरक्षित रखा है। बाद में उसी स्थान 'शांतिवन' पर नेहरू का अंतिम संस्कार किया गया। 1962 में अवकाश प्राप्त कर डॉ. राजेंद्र प्रसाद पटना के सदाकत आश्रम में रहने लगे। उसी वर्ष चीन ने भारत पर आक्रमण किया और भारत की रक्षा व्यवस्था और सैन्य शक्ति की पोल खुल गई। पटना के गांधी मैदान में एक बड़ी जनसभा का आयोजन किया गया था। आचार्य कृपलानी, राममनोहर लोहिया के साथ-साथ डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भी सभा को संबोधित किया। राजेंद्र प्रसाद के बारे में यह मशहूर था कि वे कभी गुस्सा नहीं करते थे लेकिन उस दिन की सभा में कृपलानी-लोहिया के साथ प्रसाद भी गुस्से में देखे गए। नेहरू और तत्कालीन रक्षा मंत्री वी. के. मेनन पर सभी जमकर बरसे। श्रोताओं के मूड से साफ था कि सभी चीन के हाथों पराजय पर भारत सरकार से क्रोधित थे। उस दिन आधी रात को पं. नेहरू विशेष विमान से दिल्ली से पटना पहुंचे। हवाई अड्डे से सीधे सदाकत आश्रम पहुंचकर राजेंद्र बाबू से मिलकर अनुरोध किया कि कम से कम वे लोहिया-कृपलानी का साथ न दें। नेहरू भयभीत थे कि अगर डॉ. प्रसाद खुलकर सरकार के विरोध में खड़े हो गए तब केंद्र सरकार और कांग्रेस पार्टी के लिए मुसीबतें पैदा हो जाएंगी। वक्त की नजाकत को देखते हुए राजेंद्र बाबू शांत रह गए थे। नेहरू की कुंठा राजेंद्र बाबू की मृत्यु के पश्चात भी जारी रही। 1963 में राजेंद्र बाबू की मृत्यु पटना में हुई। नेहरू अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुए। जब उन्हें जानकारी मिली कि राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन अंतिम संस्कार में शामिल होने पटना जा रहे हैं तब उन्होंने टेलीफोन कर उन्हें मना किया। राधाकृष्णन ने नेहरू की बात नहीं मानी। उन्होंने कहा कि ''मैं तो जाऊंगा ही और मेरा सुझाव है कि आप भी चलें''। नेहरू ने इनकार कर दिया। पहले से निर्धारित किसी प्रदेश में आयोजित जनसभा को उन्होंने प्राथमिकता दी-देश के प्रथम राष्ट्रपति के अंतिम संस्कार को नहीं। डॉ. प्रसाद के प्रति नेहरू की कुंठा से दोनों के नजदीकी अच्छी तरह परिचित थे। मैनेजर पांडे कहते हैं, चूंकि डॉ. प्रसाद के परिवार से कोई राजनीति में नहीं आया, इसलिए वे उपेक्षित रहे। डॉ. प्रसाद के बड़े बेटे मृत्युंजय प्रसाद ने पटना स्थित जीवन बीमा निगम से संभागीय प्रबंधक के रूप में अवकाश प्राप्त किया। हां, 1977 में आपातकाल के बाद घोषित चुनाव में अवश्य वे जनता पार्टी की टिकट पर लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए। 1980 के चुनाव में वे खड़े नहीं हुए। दूसरे एवं तीसरे बेटे धनंजय प्रसाद व जनार्दन प्रसाद छपरा में लगभग उपेक्षित जिंदगी जीते रहे। थोड़ी-बहुत खेती बाड़ी और एक स्थानीय बस परमिट से आजीविका चलाते थे वे। राजेंद्र प्रसाद के परिवार तथा किसी भी रिश्तेदार ने उनके पद का लाभ नहीं उठाया। राजेंद्र प्रसाद स्वयं तो नहीं ही चाहते थे, नजदीकी रिश्तेदार भी राष्ट्रपति पद की गरिमा पर कोई आंच नहीं आने देना चाहते थे। फिर यह देश इतना कृतघ्र कैसे हो गया कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे आदर्श पुरूष की स्मृति में कोई 'दिवस' समर्पित नहीं कर पाया? चाटुकारिता और वंशवाद का वर्तमान दौर वस्तुत: डॉ. प्रसाद जैसी महान विभूति की उपस्थिति को बर्दाश्त नहीं करता। आजाद भारत के लोकतंत्र का यह एक स्याह अध्याय है।
Thursday, December 3, 2009
राजेंद्र प्रसाद की स्मृति में कोई दिवस?
तीन दिसंबर को छोटे स्तर पर ही सही एक बहस छिड़ी थी कि 'राष्ट्रीय सम्मान' की पात्रता क्या हो? व्यक्ति विशेष की योग्यता, देश के लिए योगदान, आदर्श व्यक्ति या जाति विशेष अथवा वंशवाद। देश के प्रथम राष्ट्रपति और भारतीय संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद के जन्मदिन पर यह बात उठी। जाने-माने साहित्यकार और समालोचक मैनेजर पांडेय की टिप्पणी आई कि ''चूंकि डॉ. राजेंद्र प्रसाद के परिवार का कोई व्यक्ति राजनीति में नहीं आया, इसलिए वे उपेक्षित हैं। वंशवाद को कभी प्रश्रय नहीं देने वाले राजेंद्र प्रसाद की ऐसी उपेक्षा अफसोसनाक है।'' कहा गया कि महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सर्वपल्ली राधाकृष्णन, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी के सम्मान में तो दिवस समर्पित किए गए हैं किंतु स्वतंत्रता आंदोलन में अमूल्य योगदान देने वाले राजेंद्र प्रसाद इससे वंचित हैं। मैनेजर पांडेय की भावना गलत नहीं है। यह सचमुच दु:खद है कि ऊपर उल्लेखित विभूतियों के नाम पर देश में शासन की ओर से 'दिवस' घोषित है किंतु अनेक मामलों में अद्वितीय राजेंद्र प्रसाद की स्मृति में सरकार की ओर से कोई 'दिवस' घोषित नहीं है। ऐसे में सवाल तो उठेंगे ही। क्या कोई सफाई दे पाएगा? चूंकि सवाल पूछने वाला वर्ग ही अत्यंत छोटा है, किसी महिमामंडित वंश का प्रतिनिधित्व तो नहीं करता। शासकीय स्तर पर सवाल का संज्ञान भी कोई नहीं ले रहा। मैनेजर पांडेय की बातों में दम है। आजादी पूर्व दो बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके डॉ. राजेंद्र प्रसाद की विद्वता के सामने कोई टिक नहीं पाता था। शांति और सादगी की प्रतिमूर्ति राजेंद्र प्रसाद जब प्रेसीडेंसी कॉलेज कलकत्ता (कोलकाता) में छात्र थे, तब परीक्षा में उनकी उत्तर-पुस्तिका जांचने वाले प्राध्यापक की टिप्पणी को याद करें। प्राध्यापक ने उत्तर-पुस्तिका में लिख दिया था कि ''The examinee is better than the examiner'' ब्रिटिश शासनकाल व आजाद भारत में भी किसी छात्र को अब तक ऐसा सम्मान नहीं मिल पाया। यह उनकी विद्वता ही थी कि भारतीय संविधान के निर्माण के लिए बनी संविधान सभा के अध्यक्ष पद पर उनका निर्वाचन किया गया। प्रसंगवश, जो बाबासाहेब आंबेडकर भारतीय संविधान के शिल्पकार के रूप में स्थापित हुए, वे संविधान सभा के सदस्य, डॉ. प्रसाद की पहल पर ही बने। विधि संबंधी डॉ. आंबेडकर के ज्ञान के कायल थे डॉ. प्रसाद। डॉ. प्रसाद की पहल पर ही डॉ. आंबेडकर को संविधान का प्रारूप तैयार करने वाली समिति का अध्यक्ष बनाया गया था। संविधान स्वीकृति के पश्चात राष्ट्रपति पद के लिए उनके चयन पर सभी एकमत थे। हां, यह सच जरूर है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू की निजी राय सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन के पक्ष में थी, लेकिन राजेंद्र बाबू के पक्ष में अन्य सभी के समर्थन को देख वे चुप रह गए। 1957 में जब पुन: राष्ट्रपति के निर्वाचन का समय आया, तब पंडित नेहरू ने दक्षिण प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों को एक पत्र लिखा। पत्र में उन्होंने डॉ. राधाकृष्णन का नाम तो नहीं नहीं लिया किंतु ऐसी इच्छा व्यक्त की थी कि अगला राष्ट्रपति कोई दक्षिण भारतीय हो। नेहरू चाहते थे कि दक्षिण के मुख्यमंत्री ऐसी मांग करें, लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी। दक्षिण के सभी मुख्यमंत्रियों ने जवाब भेज दिया कि जब तक राजेंद्र प्रसाद उपलब्ध हैं, उन्हें ही राष्ट्रपति बनना चाहिए। राजेंद्र प्रसाद 1957 में दोबारा राष्ट्रपति चुने गए। ऐसी थी उनकी राष्ट्रीय स्वीकार्यता व लोकप्रियता। नेहरू के विरोध को जानकार उनकी कुंठा बताते हैं। तो क्या पंडित नेहरू राजेंद्र प्रसाद की विद्वता से भयभीत रहते थे?
Wednesday, December 2, 2009
राज ठाकरे का नया अपराध !
दुखी मन से ही सही इस सच को स्वीकार करना पड़ रहा है कि अनेक संभावनाओं से परिपूर्ण राज ठाकरे भरी जवानी में अपना मानसिक संतुलन खो बैठे हैं। बाल ठाकरे में इसके लक्षण तो बुढ़ापे में पाए गए किंतु राज तो बेचारे अभी जवान हैं। अगर कोई इस निष्कर्ष को गलत को साबित कर दे तो निश्चय ही वह दूसरी संभावना को झूठ नहीं साबित कर पाएगा। और यह दूसरी संभावना है कि राज ठाकरे एक ऐसे शातिर दिमाग का धारक है जो अपनी राजनीति चमकाने के लिए देश और संविधान को रौंदने में नहीं हिचकता। जिस प्रदेश महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई पर वह अपनी बपौती का दावा करता है, उसकी महान संस्कृति, उसके वैभव, उसके साहित्य और इतिहास के साथ हर दिन, हर पल खिलवाड़ करने से नहीं चूकता यह शख्स। कोई शातिर दिमागधारी ही अपनी अज्ञानता को अपने अनुयायियों पर थोप उन्हें मूर्ख बनाए रखेगा। राज ठाकरे ने अपनी पार्टी के विधायकों को ज्ञान दिया कि हिंदी देश की राष्ट्रभाषा बिलकुल नहीं है और यह कि हिंदी भाषा के बराबर ही हर राज्य की भाषा का महत्व है। अब राज जैसे अज्ञानी को कोई यह समझाएगा कि देश की राजभाषा ही राष्ट्रभाषा मानी जाती है? संविधान का उल्लेख करने वाले राज ठाकरे भारतीय संविधान के अनु'छेद 343(1) को पढ़ लें। इस अनु'छेद के अनुसार, देवनागरी में लिखित हिंदी संघ की राजभाषा है। अब अगर राज ठाकरे 'संघ' का अर्थ नहीं समझते तो कोई क्या करे? वैसे खीझ तो हो रही है किंतु उन्हें बता दूं कि संघ का अर्थ भारत देश है। देश के बहुभाषी व बहुसंस्कृति स्वरूप के कारण अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को भी संवैधानिक दर्जा दिया गया। त्रि-भाषा फार्मूला के द्वारा हिंदी के साथ अंग्रेजी व क्षेत्रीय भाषाओं के प्रयोग की छूट दी गई। किंतु, पूरे भारतीय संघ को एक सूत्र में बांधे रखने के लिए हिंदी और सिर्फ हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया। देश की भाषाई एकता के पक्ष में क्षेत्रीय भाषाओं को सम्मान दिया गया क्योंकि हिंदी का किसी के साथ कोई बैर नहीं। लेकिन, क्षेत्रीयता व धर्म की राजनीति करने वाले कतिपय संकुचित विचार के राजनीतिकों ने अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए भाषा की राजनीति शुरू कर दी। एक ऐसी राजनीति जिसने देश की एकता और अखंडता पर सीधे प्रहार करने शुरू कर दिए। दक्षिण, विशेषकर तमिलनाडु, में सर्वप्रथम इसका राजनीतिकरण हुआ। अत्यंत ही दु.खद रूप से भाषा और क्षेत्रीयता के आधार पर वहां गठित राजनीतिक दलों ने राजनीतिक सफलताएं तो प्राप्त कीं लेकिन स्वयं को शेष भारत से लगभग अलग-थलग कर लिया। समाज में क्षेत्रीय और भाषाई घृणा के विष घोल डाले। ठाकरे एंड कंपनी अब उन्हीं के मार्ग पर चलते हुए भाषा और क्षेत्रीयता के जहर के सहारे समाज को छिन्न-भिन्न करने पर तुली है। अराजकता और वैमनस्य को सिंचित कर रही है। ठाकरे राजनीति करना चाहते हैं, करें। सत्ता प्राप्त करना चाहते हैं, जरूर करें। किंतु, इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए भाषा को जहरीला न बनाएं- सामाजिक एकता को खंडित न करें।
एक महत्वपूर्ण बात और। राज ठाकरे ने हिंदी के संबंध में 'ज्ञान' का बखान अपनी पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के समक्ष किया। नवनिर्वाचित विधायकों को विधायकी की जानकारी और शिष्ट आचरण करने के निर्देश की जगह भाषाई घृणा का पाठ पढ़ाने वाले राज ठाकरे गुनाहगारों की मदद के गुनाहगार भी बन गए। अशिष्ट और असंसदीय आचरण के कारण निलंबित विधायकों का सत्कार कर ठाकरे ने निश्चय ही जान-बूझकर पूरी विधानसभा और अध्यक्ष को ठेंगा दिखाया है। उनका यह कृत्य विधानसभा की अवमानना है। सर्वोच्च न्यायालय को राज ठाकरे की उद्दंडता के विरुद्ध उठाए गए कदमों की जानकारी देने वाली महाराष्ट्र सरकार क्या उनके इस नए अपराध का संज्ञान लेगी?
एक महत्वपूर्ण बात और। राज ठाकरे ने हिंदी के संबंध में 'ज्ञान' का बखान अपनी पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के समक्ष किया। नवनिर्वाचित विधायकों को विधायकी की जानकारी और शिष्ट आचरण करने के निर्देश की जगह भाषाई घृणा का पाठ पढ़ाने वाले राज ठाकरे गुनाहगारों की मदद के गुनाहगार भी बन गए। अशिष्ट और असंसदीय आचरण के कारण निलंबित विधायकों का सत्कार कर ठाकरे ने निश्चय ही जान-बूझकर पूरी विधानसभा और अध्यक्ष को ठेंगा दिखाया है। उनका यह कृत्य विधानसभा की अवमानना है। सर्वोच्च न्यायालय को राज ठाकरे की उद्दंडता के विरुद्ध उठाए गए कदमों की जानकारी देने वाली महाराष्ट्र सरकार क्या उनके इस नए अपराध का संज्ञान लेगी?
Tuesday, December 1, 2009
ये कैसे 'अगंभीर' सांसद !
तो ऐसे हैं हमारे निर्वाचित जनप्रतिनिधि! इनके सीने पर चस्पा है सांसद का तमगा। भारतीय संसद के सम्माननीय सदस्य हैं ये। भारीभरकम वेतन-भत्ता। रेल-हवाई जहाज से मुफ्त यात्रा की सुविधा। हर जगह प्राथमिकता के आधार पर उपलब्ध सुख-सुविधा। दिल्ली में शानदार आवास और दैनंदिन कामकाज के लिए उपलब्ध सहायक-सेवक। विशेषाधिकार के अंतर्गत अनेक मामलों में विशिष्ट कानूनी संरक्षण। लगभग 115 करोड़ भारत की आबादी का संसद में प्रतिनिधित्व करते हैं ये 795 सांसद। आश्चर्य है कि हमारे ये सांसद इस महत्वपूर्ण तथ्य से अनभिज्ञ कैसे हैं। जी हां! अनभिज्ञ हैं ये अपनी जिम्मेदारियों से। अनभिज्ञ हैं ये देश व जनता के प्रति अपनी जवाबदेही से। अनभिज्ञ हैं ये इस तथ्य से कि उनके कपड़ों की सफेदी और राजसी ठाठबाट के खर्चे आम नागरिक की जेब से ही आते हैं। संसद की कार्यवाही पर होने वाले लाखों-करोड़ों के व्यय का बोझ भी जनता की जेबें सहन करती हैं। फिर ये इतने लापरवाह कैसे हो गए? संसद में प्रश्र पूछने की कागजी औपचारिकता पूर्ण करने के बावजूद प्रश्रकाल में इनकी अनुपस्थिति निश्चय ही संसद के प्रति इनकी अगंभीरता चिन्हित करती है। बल्कि यह संसद की अवमानना है। फिर क्यों नहीं ऐसे सदस्यों के खिलाफ कार्रवाई की जाए? संसदीय प्रणाली व संविधान में अगर ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है तब संशोधन कर ऐसी व्यवस्था की जाए। क्या लोकसभा के अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति यह सुनिश्चित करेंगे? पिछले सोमवार को लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान 32 सांसदों द्वारा पूछे गए प्रश्र जब सामने आए तब पता चला कि उनमें से सिर्फ 2 सदस्य उपस्थित थे। क्या यह संसद की अवमानना नहीं? जब सदन के अंदर हो-हल्ला करने वाले सदस्यों के खिलाफ कार्रवाई की जाती है, उन्हें बाहर कर दिया जाता है, उन्हें निलंबित कर दिया जाता है, तब ऐसी ही कार्रवाई इन सांसदों के खिलाफ क्यों नहीं? बल्कि इन सांसदों का अपराध तो कहीं अधिक गुरुत्तर है। ऐसी ही स्थितियां निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाए जाने के अधिकार की मांग को मजबूत करती हैं। मतदाता निश्चय ही ऐसा अधिकार चाहेगा। क्योंकि निर्वाचित जनप्रतिनिधि यहां मतदाता से विश्वासघात करते दिख रहे हैं। देश का सबसे बड़ा लोकतंत्र ऐसी स्थिति को कैसे और क्यों स्वीकार करे? देश किसी की बपौती नहीं। लोकतंत्र पर किसी का एकाधिकार नहीं हो सकता। निर्वाचित जनप्रतिनिधि भी यह गांठ बांध लें कि वे देश के लिए अपरिहार्य कदापि नहीं हैं। जनता के विश्वास पर अगर वे खरे नहीं उतरते हैं तब वह दिन दूर नहीं जब दंडित करने के लिए मतदाता 5 वर्षों तक प्रतीक्षा नहीं करेंगे। जब भारतीय संविधान जनता का, जनता के लिए, जनता के द्वारा तैयार है तब सर्वोच्च भारतीय संसद पर भी अधिकार अंतत: जनता का ही है। जरूरत पडऩे पर जनता दोषी जनप्रतिनिधियों को दंडित करने के लिए तत्संबंधी संविधान संशोधन के पक्ष में सरकार को मजबूर कर देगी। कांगे्रस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रश्रकाल के दौरान संसद में अनुपस्थित अपनी पार्टी के सांसदों की सूची मंगाई है। यह संकेत है कि पार्टी मुखिया ने इस मामले को गंभीरता से लिया है। अन्य दलों के नेता भी इसका अनुसरण करें और यह सुनिश्चित करें कि भविष्य में उनके सांसद संसद को अगंभीर नहीं बनने देंगे, संसद को मखौल नहीं बनने देंगे।
Monday, November 30, 2009
कोड़ा का सच कभी सामने आएगा
मधु कोड़ा गिरफ्तार तो हुए किंतु इस पूरे प्रकरण में जो यक्ष प्रश्न खड़े हो गए हैं, क्या कभी उनके जवाब मिल पाएंगे? सत्तापक्ष सतर्कता आयोग, प्रवर्तन निदेशालय या फिर आयकर विभाग चाहे जितनी सफाई, जितना तर्क दे लें इस मामले में 'सच' और 'न्याय' अंधेरे में और संदिग्ध बने रहेंगे। हजारों करोड़ रूपए के हवाला मामले में आरोपित कोड़ा पूरे देश की सत्ता राजनीति में एक अकेले ऐसे उदाहरण हैं, जो मात्र 5 विधायकों के गुट के नेता के रूप में झारखंड के मुख्यमंत्री बने थे। कैसे संभव हुआ था ऐसा? प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के सर्वाधिक विधायक थे। जोड़-तोड़ और खरीद-फरोख्त की घिनौनी राजनीति को हवा दी गई और भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए कांग्रेस-झामुमो और राजद ने मिलकर मधु कोड़ा के सिर पर मुख्यमंत्री का ताज रख दिया। इन दलों के अवसरवादी समर्थन से कोड़ा अच्छी तरह वाकिफ थे। बल्कि मुख्यमंत्री की कुर्सी के एवज में कोड़ा से जो वादे लिए गए, 'कोड़ा कांड' का बीजारोपण तभी हो गया था। नीचे से उपर तक भ्रष्टाचार से ओत-प्रोत भारतीय राजनीति में एक बार फिर गंदा खेल खेला गया था। सिर्फ पाने और गंवाने के नाम पर शून्य के धारक कोड़ा ने तब अगर भ्रष्टाचार की गंगोत्री के द्वार खोल दिए, फिर आश्चर्य क्यों? व्यवस्था में निर्दलीयों की भागीदारी न होने के बावजूद उन्हें सिर पर बैठाने की इस परिणति पर फिर विलाप क्यों? सभी जिम्मेदार हैं इसके लिए। चाहे कांग्रेस नेतृत्व हो या राष्ट्रीय जनता दल के लालू यादव 'कोड़ा कांड' के सूत्रधार-लेखक ये ही हैं। चुनौती है जांच एजेंसियों को कि वे दूध का दूध और पानी का पानी कर दिखाएं। कोई भी निष्पक्ष जांच सभी को घेरे में ले लेगी। 'गंगोत्री' के 'चरणामृत' को सभी ग्रहण कर चुके हैं। चूंकि कोड़ा की गिरफ्तारी को लेकर अनेक शंकाएं प्रकट की जा रही थीं, मीडिया ने नजर गड़ा रखी थी। झारखंड विधानसभा चुनाव में खुलकर प्रचार कर रहे कोड़ा अपने विरूद्ध जारी किए गए 'समन' की अवहेलना कर रहे थे। घोषणा कर दी थी कि चुनाव के बाद ही वे पूछताछ के लिए उपलब्ध होंगे। विपक्ष इसे साजिश बता रहा था। आरोप लगी कि जांच एजेंसियां जान-बूझकर उन पर हाथ नहीं डाल रही हैं। यह भी कहा गया कि जांच मंद कर दी गई है और दिशा से भटक रही है। बेशक ये बहुप्रचारित आशंकाएं ही कोड़ा की तत्काल गिरफ्तारी का कारण बनीं। अब गेंद जांच एजेंसियों के पाले में है। आरोप सिद्ध होने पर राजनीति से संन्यास ले लेने की घोषणा करने वाले कोड़ा का अपराध कभी साबित हो पाएगा? लोगों की शंका के कारण मौजूद हैं। जांच एजेंसियों को चुनौतियां यूं ही नहीं दी जा रहीं। दिल्ली में बैठे सत्तापक्ष की इस मामले में अंतर्लिप्तता से इनकार फिलहाल संभव नहीं। इसलिए भी जरूरी है कि पूरे मामले की निष्पक्ष और तत्काल जांच हो। अन्यथा संदेहों के काले बादल हमेशा विद्यमान रहेंगे। संसदीय लोकतंत्र और इसके तीनों स्तंभ न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका निष्क्रियता और पक्षपात के अपराधी बन जाएंगे। अविभाजित बिहार के लिए यह दूसरा अवसर है जब कोई पूर्व मुख्यमंत्री गिरफ्तार हुआ है। इसके पूर्व 1970 में एक अन्य पूर्व मुख्यमंत्री सतीश प्रसाद सिंह अपने निजी मेडिकल कालेज में घपले के आरोप में गिरफ्तार हो चुके हैं। क्या यह सिलसिला जारी रहेगा?
Sunday, November 29, 2009
बहस हो कि सांप्रदायिक कौन!
न्यायमूर्ति मनमोहन सिंह लिबरहान के पूर्वाग्रह को कभी इंदिरा गांधी के राजनीतिक सलाहकार रह चुके कांग्रेस के वरिष्ठ नेता माखनलाल फोतेदार ने मोटी रेखा से चिह्नित कर दिया है। लिबरहान ने बाबरी मस्जिद विध्वंस पर अपनी जांच रिपोर्ट में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव को क्लीन चिट देते हुए टिप्पणी की है कि नरसिंह राव के पास उत्तर प्रदेश सरकार से गुजारिश करने के सिवा कोई चारा नहीं था। बगैर मांगे न्यायमूर्ति लिबरहान ने राव की ओर से ऐसी सफाई दे डाली है। लिबरहान जानते थे कि ऐसे सवाल उठेंगे कि उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार को पहले बर्खास्त क्यों नहीं किया गया। संविधान का सहारा लेते हुए स्वयं न्यायमूर्ति लिबरहान ने तकनीकी जवाब दे दिया कि बगैर राज्यपाल की अनुशंसा के केंद्र सरकार कोई कार्रवाई नहीं कर सकती थी। आयोग के इस निष्कर्ष के औचित्य पर राष्ट्रीय बहस छिड़ी हुई है। इस बीच माखनलाल फोतेदार ने यह जानकारी देकर कि स्वयं प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने तत्कालीन राज्यपाल सत्यनारायण रेड्डी को कह रखा था कि बगैर उनसे पूछे राज्य सरकार के खिलाफ कोई रिपोर्ट नहीं भेजना, एक बड़ा विस्फोट किया है। बात यहीं खत्म नहीं होती। फोतेदार के अनुसार यह बात उन्हें किसी और ने नहीं बल्कि तत्कालीन राष्ट्रपति डाक्टर शंकरदयाल शर्मा ने बताई थी। लिबरहान आयोग की रिपोर्ट पर जारी बहस-विवाद के बीच इस नई जानकारी ने कांग्रेस को कटघरे में खड़ा कर दिया है। फोतेदार के शब्दों पर अविश्वास का कोई कारण नहीं है। क्या इससे यह प्रमाणित नहीं होता कि हिंदू शक्तियों के साथ तब की कांग्रेसी सरकार भी बाबरी मस्जिद के विध्वंस के लिए जिम्मेवार थी? माक्र्सवादी वृंदा करात ने तो यह भी जड़ दिया कि कांग्रेस सांप्रदायिकता के खिलाफ नर्म रुख रखती है। इस घटना विकासक्रम के बाद दो अहम् सवाल खड़े हो गए। पहला तो यह कि राज्यपाल कब तक केंद्र सरकार के इशारे पर नाचने को मजबूर रहेंगे। दूसरा यह कि देश में आखिर कब तक सांप्रदायिकता की कबड्डी खेली जाती रहेगी। क्या यह दोहराने की जरूरत है कि जब तक राजनीतिक (पालिटीशियन) और चापलूस नौकरशाह राज्यपाल बनाए जाते रहेंगे, वे केंद्र के गुलाम रहेंगे? संविधान प्रदत्त अधिकारों का इस्तेमाल वे अपने विवेक से कभी नहीं कर पाएंगे। 1983 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सर्वोच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजेंद्र सिंह सरकारिया की अध्यक्षता में एक सदस्यीय आयोग का गठन कर अन्य बातों के अलावा राज्यपालों की भूमिका की जांच का जिम्मा दिया था। न्यायमूर्ति सरकारिया ने 1600 पृष्ठों की अपनी विस्तृत रिपोर्ट में राज्यपाल के पद पर राजनीतिकों, अवकाश प्राप्त सरकारी अधिकारियों की नियुक्ति नहीं किए जाने की अनुशंसा की थी। लेकिन किसी भी सरकार ने इस पर अमल नहीं किया। और तो और एक बार जब उत्तरप्रदेश के राज्यपाल रोमेश भंडारी ने वहां की सरकार को बर्खास्त करने की सिफारिश की थी तब धरने पर बैठे अटल बिहारी ने घोषणा की थी कि जब भाजपा की सरकार केंद्र में बैठेगी, वे सर्वप्रथम सरकारिया आयोग की रिपोर्ट पर पड़ी धूल की परतों को साफ करेंगे। खेद है कि वाजपेयी के शब्द भी आम राजनीतिक के शब्द बन कर रह गए। भाजपा शासनकाल में भी राज्यपालों की नियुक्ति के मापदंड वही रहे जो कांग्रेस ने अपनाया था और आज भी अपना रही है। फिर क्या आश्चर्य कि आज की नई पीढ़ी राजनीतिकों पर विश्वास करने को तैयार नहीं। क्या ये राजनीतिक कभी विश्वनीय बनेंगे?
रही बात सांप्रदायिकता की तो चूंकि दोनों बड़े दलों, कांग्रेस व भाजपा, में अपेक्षाकृत युवा नेतृत्व के पक्ष में बयार बह रही है, यह माकूल समय है जब इस बात का फैसला हो जाए कि यह सांप्रदायिकता आखिर है क्या और सांप्रदायिक कौन है? वर्तमान राजनीति के हमाम से जब भी सांप्रदायिकता के बुलबुले उठते हैं, निशाने पर भाजपा व संघ परिवार रहता है। क्या यह नैसर्गिक न्याय के खिलाफ नहीं? हिंदुत्व की बात करने वाले को सांप्रदायिक और किसी और धर्म की बात करने वाले को धर्मनिरपेक्ष निरूपित करने की परिपाटी अब खत्म होनी चाहिए। आज की पीढ़ी यह भी जानना चाहती है कि हिंदू-मुसलमान के नाम पर देश के बंटवारे के पक्षधर धर्मनिरपेक्ष कैसे हो गए? इस पर राष्ट्रीय बहस हो और हमेशा के लिए फैशन के रूप में प्रचलित सांप्रदायिक शब्द के प्रयोग पर विराम लग जाए। युवा पीढ़ी और देश के भविष्य के लिए यह जरूरी है। सभी राजनीतिक दल, सामाजिक संस्थाएं और मीडिया इसके लिए पहल करें। तार्किक परिणिति पर पहुंचने तक बहस चले- बिल्कुल निष्पक्ष, तथ्य परक, बेबाक। दलगत लाभ-हानि के विचार त्याग कर ही यह संभव हो सकता है। अगर सचमुच भारत के राजनीतिक दल देश में सर्वधर्म समभाव और सांप्रदायिक सौहार्द्र चाहते हैं, तब वे आगे आएं- बगैर किसी पूर्वाग्रह के, बगैर किसी दुर्भावना के। अन्यथा अयोध्या और बाबरी मस्जिद और फिर लिबरहान आयोग जैसी खबरें बनती रहेंगी, कोई हल कभी नहीं निकलेगा।
रही बात सांप्रदायिकता की तो चूंकि दोनों बड़े दलों, कांग्रेस व भाजपा, में अपेक्षाकृत युवा नेतृत्व के पक्ष में बयार बह रही है, यह माकूल समय है जब इस बात का फैसला हो जाए कि यह सांप्रदायिकता आखिर है क्या और सांप्रदायिक कौन है? वर्तमान राजनीति के हमाम से जब भी सांप्रदायिकता के बुलबुले उठते हैं, निशाने पर भाजपा व संघ परिवार रहता है। क्या यह नैसर्गिक न्याय के खिलाफ नहीं? हिंदुत्व की बात करने वाले को सांप्रदायिक और किसी और धर्म की बात करने वाले को धर्मनिरपेक्ष निरूपित करने की परिपाटी अब खत्म होनी चाहिए। आज की पीढ़ी यह भी जानना चाहती है कि हिंदू-मुसलमान के नाम पर देश के बंटवारे के पक्षधर धर्मनिरपेक्ष कैसे हो गए? इस पर राष्ट्रीय बहस हो और हमेशा के लिए फैशन के रूप में प्रचलित सांप्रदायिक शब्द के प्रयोग पर विराम लग जाए। युवा पीढ़ी और देश के भविष्य के लिए यह जरूरी है। सभी राजनीतिक दल, सामाजिक संस्थाएं और मीडिया इसके लिए पहल करें। तार्किक परिणिति पर पहुंचने तक बहस चले- बिल्कुल निष्पक्ष, तथ्य परक, बेबाक। दलगत लाभ-हानि के विचार त्याग कर ही यह संभव हो सकता है। अगर सचमुच भारत के राजनीतिक दल देश में सर्वधर्म समभाव और सांप्रदायिक सौहार्द्र चाहते हैं, तब वे आगे आएं- बगैर किसी पूर्वाग्रह के, बगैर किसी दुर्भावना के। अन्यथा अयोध्या और बाबरी मस्जिद और फिर लिबरहान आयोग जैसी खबरें बनती रहेंगी, कोई हल कभी नहीं निकलेगा।
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